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Ghazal Kavita Zaki Tariq

भरे तो कैसे परिंदा भरे उड़ान – Hindi Kavita by Zaki Tariq

 भरे तो कैसे परिंदा भरे उड़ान कोई  नहीं है तीर से ख़ाली यहाँ कमान कोई  थीं आज़माइशें जितनी तमाम मुझ पे हुईं  न बच के जाएगा अब मुझ से इम्तिहान कोई  ये तोता मैना के क़िस्से बहुत पुराने हैं  हमारे अहद की अब छेड़ो दास्तान कोई  नए ज़माने की ऎसी कुछ आँधियाँ उट्ठीं  रहा सफ़ीने […]

Kavita

अक्सर दरखतो के लिए – Kavita by Sarveshwar Dayal Saxena

अक्सर दरख्तों के लिये जूते सिलवा लायाऔर उनके पास खडा रहा वे अपनी हरीयाली अपने फूल फूल पर इतराते अपनी चिडियों में उलझे रहेमैं आगे बढ़ गयाअपने पैरों कोउनकी तरह जड़ों मेंनहीं बदल पायायह जानते हुए भीकि आगे बढना निरंतर कुछ खोते जानाऔर अकेले होते जाना है मैं यहाँ तक आ गया हूँ जहाँ दरख्तों […]