तेरे प्यार की छाँव – Kavita – by Sanchita Shukla (Kavitalay Member)

Home » Member Posts » तेरे प्यार की छाँव – Kavita – by Sanchita Shukla (Kavitalay Member)
Member Posts
तेरे प्यार की छाँव की आस है
मैं किसी धूप सा जलता फिरता हूँ

दूर कर दिया तूने मुझे खुद की गर्मी से
मैं किसी बर्फ़ सा हर रोज़ ही जमता हूँ

बरस पाऊँ बारिश सा सावन में कभी
मैं कही बादल सा आवारा फिरता हूँ

सहलाती है ठंडी हवा गालों को तेरे
मैं तूफ़ानों सा दरिया में उठता हूँ

रात में चाँदनी बिखेरती है रोशनी चाँद की
मैं अमावस सा खुद में सिमटता हूँ

एक घरोंदा बने मेरा इसी चाह में
किसी टूटे मकान सा मोड़ पे खड़ा रहता हूँ।।

-- Sanchita Shukla

1 thought on “तेरे प्यार की छाँव – Kavita – by Sanchita Shukla (Kavitalay Member)

Leave a Reply

%d bloggers like this: