Kavita – चाहत – By Salil Saroj (Kavitalay Member)

तेरे शहर में फिर से आना चाहता हूँ मैं
मेरा दिल फिर से जलाना चाहता हूँ मैं|


जो आग लगी  लेकिन फिर बुझी  नहीं
उसी राख से धुआँ उठाना चाहता हूँ मैं|


इक दरख्त पे अब भी तेरा मेरा नाम है
उसे अब शाख से मिटाना चाहता हूँ मैं|


तेरे नाम के  किताबों में  जो गुलाब  हैं
उन सब को घर से हटाना चाहता हूँ मैं|


जितनी भी उम्र बढ़ाई तेरी मोहब्बत ने
वो एक-एक लम्हा घटाना चाहता हूँ मैं|


कैसे जिया जाता है किसी से बिछड़के
बड़े गौर से तुमको बताना चाहता हूँ मैं|
--सलिल सरोज

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