Kavita – जिन्दगी – By Prem Srivastava (Kavitalay Member)

सोचा था सपनो को बहुत उँची उड़ान दूँगा
इस छोर से उस छोर तक दुनीया छान दूंगा
बचपन में छान देते थे जैसे सारा मुहल्ला
सोचा वैसे ही जिन्दगी को एक मुकाम दूंगा।

मासूम था वो बचपन जहाँ तारों के साये में सोते थे
एक छोटे से खिलौने के लिए जिद्द पकड़ कर रोते थे
जाने कहाँ वो बचपन खिलौनो संग सो गया
समझदारो की इस भीड़ में वो बचपन खो गया।

खड़े होकर पैरों पर हम भीड़ में चल दिए
अनसुलझी पहेलियों को सुलझाने निकल दिए
जिंदगी को सुलझाने में खुद इतने उलझ गए
अकेले चले थे सफर में, अकेले ही रह गए।

मिलते बिछड़ते दोस्तों का कारवाँ चलता रहा
कितनों का साथ छूटा, यूं दिन निकलता रहा
जिन्दगी अपने खेल यूं ही दिखाती रही
सपनों के साथ अपने मैं आगे निकलता रहा।

एक हाथ थाम कर भीड़ में थोड़ा सुकुन मिला
जिन्दगी फिर से जीने का नया जुनून मिला
दुनिया से लड़ गया सपने आँखो में लिए
सपना था, टुट गया, फिर अकेले चल दिए।।
--Prem Srivastava

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