ग़ज़ल – शाद के लम्हें मिले भी खूब थे -By प्रज्ञा देवले

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शाद के लम्हें मिले भी खूब थे,
हम लगे ग़म के गले भी खूब थे ।

अब नहीं शिकवा किसी से क्या गिला,
हम जिये भी हम मरे भी खूब थे ।

मुस्कुराहट थी लबों पे शादमाँ,
आँख में आँसू लिखे भी खूब थे ।

हम रहा करते थे काँटों में कभी,
जीने के क्या ह़ौंस़ले भी खूब थे ।

घर से सड़कों पे कदम कदमों तले,
रास्तों को नापते भी खूब थे।

आम जब पेड़ों पे कच्चा दिख गया,
हम गुलेले तानते भी खूब थे ।

है मुबाइल देख लो अब हाथ में,
हम कभी सब खेलते भी खूब थे।

जब फिरंगी छोड़ भारत को चला,
हम परिंदे तब उड़े भी खूब थे ।

आज जिंदा है बशर आजाद है,
बँधनों में हम मिटे भी खूब थे ।

क्रांति की तलवार मुट्ठी में लिए,
अपनी सिंधू पे कटे भी खूब थे ।

थी मुसीबत देश पर हम मर मिटे,
हम मुहब्बत को जानते भी खूब थे ।

–प्रज्ञा देवले

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