कृति मै सर्वश्रेष्ठ हूंँ – Award Winning Hindi Kavita by Sarika Thakur

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"कृति मै सर्वश्रेष्ठ हूंँ"

क्यों करूंँ तेरी बराबरी, 
जब स्वयं ही मैं श्रेष्ठ हूंँ।
उस विधाता के सृजन की,
कृति मै सर्वश्रेष्ठ हूंँ ।।

है तुझे अभिमान
अपने जिस अस्तित्व का ।
वह भी एक उपहार है,
मेरे ही कृतित्व का।।

करके यूंँ अपमान, 
आज मेरे आंँचल का।
बन रहा स्वयं ही अहंकारी,
अपने ही व्यक्तित्व का। 

क्यों तुझसे डरकर रहूंँ ,
जब स्वयं ही मैं श्रेष्ठ हूंँ ।
उस विधाता के सृजन की,
कृति मैं सर्वश्रेष्ठ हूंँ।।

अरे विधाता ने रचा था, 
हम दोनों को किस भाव से ।
करेंगे जगमग जग सारा,
हम अपने प्रेम प्रभाव से।। 

मैं झुकती गई प्रेम मे,
तू अभिमान में अकड़ता रहा।
नोच रहा अब मुझको ही,
तू अपने दुर्व्यवहार से।।

क्यों बनूंँ मैं तुझ जैसी,
जब स्वयं ही मैं श्रेष्ठ हूंँ ।
उस विधाता के सृजन की
कृति मैं सर्वश्रेष्ठ हूंँ।।

त्याग में बलिदान में,
या निज स्वाभिमान में।
हो वीरता या धीरता,
या रिश्तों के सम्मान में।।

हो चांँद की पहुंँच,
या युद्ध के मैदान में।
किया है मैंने जीवन अर्पित,
मानवता की शान में।। 

मत भूल कि नारी हूंँ मैं,
स्वयं में ही श्रेष्ठ हूंँ ।
उस विधाता के सृजन की,
कृति मैं सर्वश्रेष्ठ हूंँ।। 

By - सारिका ठाकुर "जागृति"

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