भविष्य में एग्रीकल्चर स्वरोजगार का बेहतर विकल्प – प्रफुल्ल सिंह

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लेखक : प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम”, युवा लेखक एवं साहित्यकार, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) |

एग्रीकल्चर स्वरोजगार का सबसे अच्छा साधन है। इससे अब अच्छी कमाई की जा सकती है। बहुत से प्रोफेशनल फार्मर साइंटिफिक फार्मिंग के जरिये न सिर्फ अच्छा पैसा कमा रहे हैं, बल्कि दूसरों को भी रोजगार दे रहे हैं। यही नहीं, प्राइवेट और गवर्नमेंट दोनों सेक्टर में एग्रीकल्चर का स्कोप तेजी से बढ़ रहा है।

पिछले दिनों विश्व के सबसे बड़े जैविक खेती थिंक टैंक इंटरनेशनल फोरम फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स तथा रिसर्च इंस्टिट्यूट फॉर आर्गेनिक एग्रीकल्चर ने संयुक्त रूप से एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की है। उनके अनुसार जैविक खेती करने वाले उत्पादकों की सबसे अधिक संख्या भारत में है। भारत में 8 लाख 35 हजार से अधिक लोग जैविक खेती कर रहे हैं। दूसरे स्थान पर मक्सिको है।

विभिन्न रिपोर्टों में वर्ष 2022 तक भारत में 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती किये जाने की सम्भावना बताई गयी है। जैविक खेती के क्षेत्र में पूर देश में अग्रणी मध्यप्रदेश में वर्ष 2001-02 में जैविक खेती का आन्दोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक ब्लाक में एक-एक गाँव में जैविक खेती शुरू की गयी है और इन गाँवों को ‘जैविक गाँव’ का नाम दिया गया है।

पुरातन काल से प्रकृति और ईश्वरीय व्यवस्था से सामंजस्य बिठाकर की जाने वाली प्राकृतिक खेती, भोजन, अनाज, जल, मानव, जमीन, वायुमंडल आदि के अस्तित्व को विदेशी और देशी षड्यंत्रकारी उद्योगपतियों, सरकारों ने हरित क्रांति की मशाल थामे रासायनिक खेती ने गहरे संकट में पहुंचा दिया है। खाद, पोषक तत्व, कीट नियंत्रण जैसी तमाम व्यवस्था ईश्वर ने प्रकृति के माध्यम से कर रखीं थीं जिसे मानव ने अपने हाथों से नष्ट कर दिया है।

अंग्रेजों और तानाशाही विश्व सत्ता ने कहने के लिए भारत और अन्य देशों को कहने के लिए तो आज़ाद कर दिया था लेकिन देश पर अपनी तमाम शोषणकारी व्यवस्थाओं की जड़ें गहरे में जमाकर गए थे जिनको देश के स्वार्थी नेताओं और उद्योगपतियों ने अपने स्वार्थ के लिए बहुत बड़ा कर दिया है। अंग्रेजियत ने सिर्फ हमारी भाषा और संस्कृति के साथ साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि आदि को भी विनाश के पथ पर अग्रसर किया है जिसे आज विकास के नाम से जाना जाता है। आज सब कुछ जानते हुए भी हम भोजन, जल, दूध, फल, सब्जियों आदि में सुबह, दोपहर, शाम, रात ज़हर खाने को मजबूर हैं।

देश में प्राकृतिक और ज़हर मुक्त खेती का विशाल जन-आंदोलन खड़े करने वाले सुभाष पालेकर  द्वारा किसानों, कृषि वैज्ञानिकों, समाज सेवी संगठनों, जागरूक नागरिकों, विद्यार्थियों और आम नागरिकों को 6 से 12 दिवसीय प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिए जाते हैं। देश भर में उन्होंने विभिन्न किसानों के माध्यम से प्राकृतिक खेती के हजारों मॉडल स्थापित किये हैं, जिनके बारे में व्यवाहारिक प्रशिक्षण, ज्ञान और भ्रमण आदि भी समय समय पर कराये जाते हैं। किसानों को अपनी फसल बिचौलियों को न बेचकर स्वयं उसका प्रसंस्करण कर सीधे उपभाक्ताओं को बेचने के लिए प्रेरित और प्रशिक्षित किया जाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार है. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता सच्चाई के प्रति कवितालय उत्तरदायी नहीं है |

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